रविवार, 1 दिसंबर 2013

Ye ghar pyara bahot hai...

                                                                  ये घर प्यारा बहुत है 

तुम्हारे महल ऊँचे
मेरा छोटा घरौंदा
मगर फिर भी हमें
ये घर प्यारा बहुत है।

यहाँ नीवों में मेरी
मधुर यादें गड़ी हैं
जो कीमत आंक पाये
तराज़ू कहाँ बनी है ?
अँधेरा जो हरता
एक सितारा बहुत है

वो बाबूजी कि लाठी
वो माँ का टूटा चश्मा
वो अधखाई दवाई पर
इबारत अधलिखी सी,
वो पीले ख़त कि खुशबू
का सहारा बहुत है।

भावनाओं कि ईंटों से
ये दीवारें तनी हैं
हवा को तर जो रखती
वफ़ा की वो नमी है
लकीरें "हम-तुम" की तोड़े
वो "हमारा" बहुत है।

वो बच्चों की तोतली
बातों का खज़ाना
वो अपनी प्यारी बिटिया
का लाल फीता पुराना
उम्र भर देखने को
ये नज़ारा बहुत है।

-Vandana Bajpai


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