बुधवार, 12 जुलाई 2023

माफ कीजिएगा

 




माफ़ कीजिएगा

ये आम रास्ता नहीं है

माना की सिरों पर चपटी है, ये गोल धरती

पर उस बित्ते भर जगह पर पहुँचने से पहले

फैला है भावनाओं का पूरा मकड़जाल

आशा- निराशा के दवंद

अज्ञान तिमिर के फंद

कि हर इंसान भाग रहा है उसकी तरफ़

जो भाग रहा है किसी दूसरे की ओर

वो दूसरा किसी तीसरे की ओर

क्योंकि जो खुद आ रहा है पास

वो नहीं लगता कभी खास

और जो मिल गया कभी खास

तो अंगुली के पोरों में उतर आता है

मैडास से उल्टा श्राप

और आम सा लगने लगता है उस खास का एहसास

धप-धप, धप -धप धम-धम, धम-धम

ये कोलाहल, ये क्रंदन

नियति है या निर्मिति

जो भी हो ये आम रास्ता नहीं है

माफ़ कीजिएगा

वंदना बाजपेयी

 

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