बुधवार, 31 दिसंबर 2014

भूकंप 


                       गूगल से साभार           
अम्मा
सही कहती थी तुम
धरती सी होती है नारी
प्रेम दीवानी सी
काटती रहती है सूर्य के चारों ओर चक्कर
बिना रुके बिना थके
और अपने अक्ष पर थोडा झुककर
नाचती ही रहती है दिन रात
कर्तव्य की धुरी पर
पूरे परिवार को
देने को हवा -पानी ,धूप
सह जाती है असंख्य पदचाप
दे कर अपना रक्त खिलाती है
फूल -फल
हां अम्मा !!!
सही कह रही हो तुम
पर .........
कभी तो विचलित होता होगा मन
चाहती होगी छण भर विश्राम
कुछ हिस्सेदारी सूरज की भी
किरने देने के अतिरिक्त
नियमों ,परम्परों से जरा सी मुक्ति
बांटना चाहती होगी जरा सा दर्द
जरा सी घुटन
भावनाओं का अतिरेक
हां शायद तभी ... तभी
हिल जाती है सूत भर
और दरक जाती है चट्टानें
बिखर जाते हैं .-, वन -उपवन ,नगर के नगर
क्या तभी आते हैं भूकंप ?
बताओ ना ...........
पर यह क्या अम्मा ?
मेरे इस प्रतिप्रश्न पर तुम मौन
आँखों में समेटे
कुछ ........अलिखित सा
शायद !!!
नहीं -नहीं ,अवश्य
तुम भी कर रही हो चेष्टा
कब से
रोकने की एक भूकंप
अन्दर ही अन्दर
वंदना बाजपेयी

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