चलो सखी
गूगल से साभार
चलो सखी !
एक बार भूल कर कर
उम्र की पायदाने
तुम्हारे बालों की सफेदी में छिपे स्याह दर्द
मेरी आखों की झुर्रियों में दफ़न अनगिनत आंसूं
चले वही मोहल्ले के नुक्कड़ की चाट की दुकान पर
जिसके तवे की टनटनाहट खीच ले जाती थी हमें
जोड़ कर अपने दो- चार आने खरीदे वही
आलू की टिकिया का एक दोना
खाए सी -सी करते हुए एक साथ
तुम पहन कर आ जाना वही
सफ़ेद झालर वाली फ्राक
जिसे सीते वक्त
ना जाने कितनी बार छेदी थी
माँ की उंगुलियां
मैं ओढ़ लूँगी माँ का गोटे वाला दुपट्टा
जिसकी उधड गयी थी बखिया
फिर भी इतराती थी
हवा में हिला कर किसी परी की तरह
लौटते समय
हांथों में हाथ दे
हँसेंगे कानफोडू हँसी जोर से
बरसों हो गए जसको सुने हुए
फिर खरीदेंगे काला वाला चूरन
बांटेंगे आधा -आधा
आओगी ना ?
एक बार भूल कर कर
उम्र की पायदाने
तुम्हारे बालों की सफेदी में छिपे स्याह दर्द
मेरी आखों की झुर्रियों में दफ़न अनगिनत आंसूं
चले वही मोहल्ले के नुक्कड़ की चाट की दुकान पर
जिसके तवे की टनटनाहट खीच ले जाती थी हमें
जोड़ कर अपने दो- चार आने खरीदे वही
आलू की टिकिया का एक दोना
खाए सी -सी करते हुए एक साथ
तुम पहन कर आ जाना वही
सफ़ेद झालर वाली फ्राक
जिसे सीते वक्त
ना जाने कितनी बार छेदी थी
माँ की उंगुलियां
मैं ओढ़ लूँगी माँ का गोटे वाला दुपट्टा
जिसकी उधड गयी थी बखिया
फिर भी इतराती थी
हवा में हिला कर किसी परी की तरह
लौटते समय
हांथों में हाथ दे
हँसेंगे कानफोडू हँसी जोर से
बरसों हो गए जसको सुने हुए
फिर खरीदेंगे काला वाला चूरन
बांटेंगे आधा -आधा
आओगी ना ?
क्या आया जा सकता है
उस अँधेरी सुरंग में आगे बढ़ते हुए
जहाँ बंद हो जाते हैं पीछे के द्वार
छूट जाते हैं वो सावन वो झूले
वो कच्ची मटर की फलियाँ
खाते हुए घूमना
वो आलू की टिकिया
पर देखो बेटी आ रही है
अपनी सखी के साथ
हां ! सखी ये तुम ही तो हो
और ये मैं ही तो हू
डाले हाथों में हाथ ,हँसते खिलखिलाते जोर से
कुछ खाते सी -सी करते हुए
हां ! जी रहीं हूँ मैं तुमको खुद को उसमें
आने का शुक्रिया सखी
हँसी की फसल रुकेगी नहीं
द्वारे की दस्तक मिटेगी नहीं
शायद
यहीं है प्रकाश
अँधेरी सुरंग में
जिसको पकड़ कर बढ़ते जा रहे हैं हम सब
अनवरत
एक दिशा में
उस अँधेरी सुरंग में आगे बढ़ते हुए
जहाँ बंद हो जाते हैं पीछे के द्वार
छूट जाते हैं वो सावन वो झूले
वो कच्ची मटर की फलियाँ
खाते हुए घूमना
वो आलू की टिकिया
पर देखो बेटी आ रही है
अपनी सखी के साथ
हां ! सखी ये तुम ही तो हो
और ये मैं ही तो हू
डाले हाथों में हाथ ,हँसते खिलखिलाते जोर से
कुछ खाते सी -सी करते हुए
हां ! जी रहीं हूँ मैं तुमको खुद को उसमें
आने का शुक्रिया सखी
हँसी की फसल रुकेगी नहीं
द्वारे की दस्तक मिटेगी नहीं
शायद
यहीं है प्रकाश
अँधेरी सुरंग में
जिसको पकड़ कर बढ़ते जा रहे हैं हम सब
अनवरत
एक दिशा में
वंदना बाजपेयी

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें