बुधवार, 31 दिसंबर 2014

                         
                              धुंध


                                                       गूगल से साभार 

जब -जब फैलती है
दुखो की चादर
एक धुंध सी दिखती है 
मेरी आँखों के सामने
जिसको दरकिनार कर
हर निस्तब्ध ,ठंडी ,स्याह निशा के बाद
स्वीकार करती हूँ
कर्म की श्रेष्ठता
स्वयं ही कृष्ण स्वयं ही अर्जुन
स्वयं ही स्वयं की उत्प्रेरक
उठा लेती हूँ गांडीव
चढ़ा लेती हूँ प्रत्यंचा
और निकल पड़ती हूँ जीवन संग्राम के मार्ग में
जहाँ धुंध भरी सड़कों पर बहुधा
दिख ही जाते है
स्वेटर पहने स्वान
और ठिठुरते बच्चे
कर्म से प्रारब्ध या प्रारब्ध वश कर्म
पुनः ........
एक धुंध सी छा जाती है
मेरे मन -मष्तिष्क पर
वंदना बाजपेयी

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