सोमवार, 7 नवंबर 2016

साक्षी है ये जिंगला




साक्षी है ये झरोखा
और साक्षी  है उसमें लगा ये जिंगला 
की मैंने स्वीकार कर लिया था 
उसको 
अपनी जिंदगी का एक हिस्सा समझ कर 
की मुट्ठी भर दानों के बदले में 
दिन भर फुदकना 
और ची - ची के स्वर से घर को गुंजायमान करना 


साक्षी है ये जिंगला
की यहीं से  जुड़े थे मेरे हाथ 
उगते सूर्य को नमस्कर करने के लिए 
फैली थी मेरी आँखे 
रात के चाँद को निहारते हुए 
और तुम्हे 
तुम्हे भी तो देखती थी 
यहीं से 
बाहर  काम पर जाते हुए
 मांग लेती थी मन्नत 
तुम्हारे सूरज - चाँद  की तरह चमकने की 


साक्षी है ये जिंगला 
की मैंने  की थी कठिन सूर्य उपासना 
हर छठ पर 
और बना दिया था सूर्य को सूर्य देव 
यहीं से मैंने निर्जल करवाचौथ रह कर 
चलनी से किये थे चाँद का दीदार 
और वो बैठा  प्रेम का प्रतीक 
यहीं से तुम्हारे 
हर संघर्ष में साथ दे कर 
तुम्हे पहुँचाया था 
इतराने लायक  उपलब्धियों पर 



साक्षी है ये जिंगला 
की जब - जब उछल  जाते हैं मेरे लिए 
 " फ़ालतू , करती क्या रहती हो , या खाली होने के शब्द 
तो पार नहीं कर पाते हैं इस जिंगले को 
तैरते हैं घर की हवाओं में 
घूँट - घूँट पीने को विवश होती हूँ मैं 
और लग जाता है 
प्रश्न चिन्ह मेरे सारे त्याग , तपस्या और वजूद पर 
तब - तब कोसती हूँ 
इस जिंगले को 
जिसकी सत्ता स्वीकारते ही 
आ जाता है 
सारा अंतर 


साक्षी बनेगा ये  जिंगला 
की जिस दिन टूट जाएगा ये 
और निकल पड़ेगी 
आम घरेलू औरतें 
अपने वजूद की तलाश में 
उस दिन 
उस दिन सूरज  भी होगा , चाँद भी और तुम भी 
पर 
न कोई देवता होगा 
न कोई दासी 

वंदना बाजपेयी 







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