मंगलवार, 8 नवंबर 2016

थाली में चाँद






जब - जब आसमान में देख कर चमकता चाँद 
पाने को हुई बेचैन
उतार लिया थाली में 
भर कर कर पानी 
हो गयी स्वप्नों के खेल में व्यस्त 
तब - तब 
रात बीतते ही यथार्थ के सूरज ने
उगते ही  सोख लिया 
थाली का पानी 
फिर एक पल भी टिक न सका चाँद का प्रतिबिम्ब 
और आसमान का चाँद इठलाता रहा अपने अस्तित्व पर 
की मन बहलाने का खेल नहीं है 
चाँद को पाना 
जब जब 
झेलोगे   सूर्य की तपिश 
चाँद स्वयं उतर आएगा 
हथेली की थाली में 
साक्षात् 


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