शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

                                                       !!!!!!!!!!!!!!!!!समर्पण !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


बचपन में 
स्मरण नहीं कब .............
जब  , अम्मा ने
बताया था शिवोपासना का महत्त्व
 कि शिव -पार्वती  सा होता है
पति -पत्नी का बंधन
 और मेरे केश गूँथते हुए
बाँध दिया था मेरा मन
तुम्हारे लिए

तब अनदेखे -अनजाने ही
तुम लगने लगे थे
चिर -परिचित
और तभी से
शुरू हो गया था
मेरा समर्पण
तुम्हारे लिए


जब तुम थे अलमस्त
गुल्ली -डंडा खेलने में
तब नंगे पाँव
शुरू हो गयी थी मेरी यात्रा
शिवाले की तरफ
तुम्हारे लिए


जब तुम किशोरावस्था में
मित्रों के साथ
गली चौराहे , नुक्कड़ पर
आनंद ले रहे थे जीवन  का
मैं जल रही थी
नन्हा सा दिया
तुलसी के नीचे
तुम्हारे लिए


जब तुम सफलता के हिमालय पर
चढ़ने के लिए
लगा रहे थे
ऐड़ी -चोटी का जोर
मैंने शुरू कर दिए थे
सोलह सोमवार के व्रत
तुम्हारे लिए


वर्षों  अनदेखा -अंजाना
 रिश्ता निभाने के बाद
जब अग्नि को साक्षी मान मंत्रोच्चार के साथ
किया था तुम्हारे जीवन में प्रवेश
तब से
पायलों की छन -छन से
चूड़ी की खन -खन से
माथे की बिंदियाँ से
हाथों की मेहँदी से
सुर और रंग में ढलती ही रही हूँ
तुम्हारे लिए


जब -जब सूखने लगा तुम्हारा जीवन
शोक और दर्द की ऊष्मा से
तो भरने को दरारे
सावन की बदली बन बरसी हूँ
तुम्हारे लिए

पर क्यों यह प्रश्न
कौंधता है
बिजली सम मन में
अब बता भी दो ना
क्या बचपन से लेकर आज तक
तुम्हारे मन में भी रहा है
वैसा ही समर्पण
मेरे लिए.………………


















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