सोमवार, 15 सितंबर 2014

!!!!!!!!!!तट !!!!!!!!!!!!

सृष्टि के प्रथम दिवस ही 
जान गयी थी मैं 
कल -कल करते जल की तरह 
मनोभावों के तेज बहाव के साथ 
इत -उत बहाना 
प्रकृति है तुम्हारी 
इसीलिए तो
सही थी हर पीड़ा और 
बन गयी थी तट
माँ ,बहन ,पत्नी बेटी के रूप में
तब से अब तक
बांधती ही रही हूँ तुम्हे
मर्यादा की सीमा रेखाओं में
तभी तो लहरायी है यह फसलें
पर सुनो !
अब
इतना भी मत प्रबल करो वेग
की टूट ही जाऊ मैं
क्योकि अगर मैं टूटी
तो न मैं रहूंगी
न तुम
और
न यह सृष्टि 

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