सोमवार, 15 सितंबर 2014

                                                        !!!!!!!!! शुक्रिया !!!!!!!!!!!




हे प्रिय 
तुम्हारे आगमन पर ही
मैंने भड़भड़ाकर
खोले थे किवाड़
बदहवास सी भागी थी
निकलकर
अपनी सुरक्षित खोल से
तुम्हारे आलिंगन के बाद ही
सीखा था
धारा के विपरीत चलना
परवाह नहीं रह गयी थी
मार्ग के काँटों की
 और लहूलुहान पैरों की
रक्त बीज सी बढ़ी थी
इक्षाशक्ति
ढूंढने को मुक्ति मार्ग
शुक्रिया दुःख
गर तुम न आते
तो मेरी जिंदगी की किताब में
सफलता के
यह सुनहरे अध्याय
कभी न लिखे जाते   

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