सोमवार, 15 सितंबर 2014

           
रक्षा बंधन 


आज बाँधी है   प्रत्यक्ष  राखी
  रोज़ बांधती हूँ अप्रत्यक्ष राखी
वो धागे कभी दिखते नहीं हैं
वो बंधन कभी मिटते नहीं हैं

वो हर आँसू  जो तुम्हारी याद में बहाया
वो हर दर्द जो तुम्हारे दर्द पर उभर आया
मेरे मन का,  आत्मा का हर वो कोना
जिस पर रहा  तुम्हारा ख़याल छाया

कितने अदृश्य धागों से बंध गए हो तुम
मेरे आँसू  और हँसी दोनों में बसे  हो तुम

स्नेह  के यह   बंधन बस एक राखी तक कहाँ सिमट पाएंगे
भाई -बहन के  रिश्ते जन्म -जन्मान्तर तक चलते जायेंगे


















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