रक्षा बंधन
आज बाँधी है प्रत्यक्ष राखी
रोज़ बांधती हूँ अप्रत्यक्ष राखी
वो धागे कभी दिखते नहीं हैं
वो बंधन कभी मिटते नहीं हैं
वो हर आँसू जो तुम्हारी याद में बहाया
वो हर दर्द जो तुम्हारे दर्द पर उभर आया
मेरे मन का, आत्मा का हर वो कोना
जिस पर रहा तुम्हारा ख़याल छाया
कितने अदृश्य धागों से बंध गए हो तुम
मेरे आँसू और हँसी दोनों में बसे हो तुम
स्नेह के यह बंधन बस एक राखी तक कहाँ सिमट पाएंगे
भाई -बहन के रिश्ते जन्म -जन्मान्तर तक चलते जायेंगे
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