सोमवार, 15 सितंबर 2014

!!!!!!नारी मन !!!!!!!1

मैं हूँ 
वो पौधा 
जिसकी जड़े कही गहरी दबी हैं 
और तना ,फूल पत्ती कही खिल रही है 
कहीं से खींचती हूँ नेह का जल 
कहीं को तृप्त करती हूँ 
दोहरा है मेरे नेह का बंधन 
दोहरी कसक 
दोहरी पीड़ा
दो पाटों के बीच
पिस -पिस कर
करती हूँ सबको तृप्त
कहीं से  टूटना कहीं  जुड़ना ही
मेरा प्रारब्ध है
उलझती हूँ स्वयं ही दोहरी भावनाओं की डालियों  में
शायद इसीलिए
बड़ा कठिन है
समझना नारी मन .......

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