"भावुक "
बचपन में
जब घर के बड़े
कुछ पढ़कर -देखकर
अचानक आँखे भर लेते
सोचती थी
कहाँ से लाते है
इतने आँसू
कहाँ है
इनकी टंकियाँ
जैसे-जैसे
मैं खुद बड़ी
होती गयी
दिल में कई
दर्द इकट्ठे
करती गयी
जिन्हे सब से
छुपाकर
रख लती हूँ
मन की
सात परतों में
दबाकर
जो अचानक कुछ
व्यथा -कथा
देख
निकल आते है
मैं झट
आंसू पोछ
मुकुरातीहूँ
मैं तो बस
भावुक हूँ …
vandana bajpai
बचपन में
जब घर के बड़े
कुछ पढ़कर -देखकर
अचानक आँखे भर लेते
सोचती थी
कहाँ से लाते है
इतने आँसू
कहाँ है
इनकी टंकियाँ
जैसे-जैसे
मैं खुद बड़ी
होती गयी
दिल में कई
दर्द इकट्ठे
करती गयी
जिन्हे सब से
छुपाकर
रख लती हूँ
मन की
सात परतों में
दबाकर
जो अचानक कुछ
व्यथा -कथा
देख
निकल आते है
मैं झट
आंसू पोछ
मुकुरातीहूँ
मैं तो बस
भावुक हूँ …
vandana bajpai
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