गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

माँ का झूठ


                                         

                               (चित्र गूगल से साभार )



माँ का झूठ



माँ
जाना चाहती हूँ
फिर बचपन में 
की जहाँ मीठी लोरियों की तानों को सुनकर
आ जाती थी नींद
जब सुनाती थी तुम
परियों की कहानियाँ
और मैं मान लेती थी
होता है कोई देश परियों का
हर दुःख दूर करने
आ जाती हैं परियां
नीली ,हरी ,लाल ,गुलाबी
बताती थी तुम
की बुराई पर होती है अच्छाई की विजय
अवतार लेकर आते है देव
झूठ का काला सम्राज्य
भाग जाता है सच का सूर्य देख कर
माँ तुम कहती रही
मैं मानती रही
हर झूठ को सच अक्षरश :
और प्रतीक्षा करती रही हर रात
किसी परी की
किसी अवतार की
किसी ऐसे सूरज की
जिसके उगते ही मिट जाएगा
अन्धेरा
नहीं माँ नहीं
अब सहा नहीं जाता
तुम्हारा झूठ
और मेरी प्रतीक्षा
हो गयी है अंतहीन
माँ ओ माँ
क्या तुम्हारी परियां ,अवतार ,सूरज
इतना जादू नहीं कर सकते
की पहुंचा दे
फिर से बचपन में
जहाँ झूठा ही सही
कम से कम
विश्वास तो था
वंदना बाजपेई

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