रविवार, 12 अप्रैल 2015

सच

सच ...............



दायित्व है मेरी कलम पर कि 
तुम सुनना चाहते हो सच
दूसरे का
तीखा –चटपटा
वैसे ही जैसे चाय के साथ खाई जाती है
मिर्चिली पकौड़ियाँ
यूँही स्वाद बदलने को
इसिलए मैं ढूढती हूँ वो पुराना जंग लगा बक्सा
जहाँ छिपे हैं सबके सच
एक -दुसरे में उलझे हुए
जहाँ एक झूठ बन जाता है दूसरे का सच
खिंच नहीं पाती है स्पष्ट रेखा
मैं परोस देती हूँ सारा का सारा
अरे यह क्या ?
उधड जाती है तुम्हारे वस्त्र की भी बखिया
झाँकने लगती है देह
खिंच जाती है दर्द की एक रेखा यहाँ से वहां तक
अचानक कसैला हो जाता है तुम्हारे मुंह का स्वाद
सच
दूसरे का भले ही जायकेदार हो
पर अपना पचाना बहुत मुश्किल

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