शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

बिकते हुए जज्बात

बिकते हुए जज्बात
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आज भटकते -भटकते
पहुँच ही गयी 
वहाँ ,जहाँ
सजी हुई मंडियों में बिक रहे थे जज्बात
बरसों पुराने
मरे ,सड़े -गले
बास मारते
जैसे बास मारती हैं मरी मछलियाँ
मछली मार्केट में
तडपे तो होंगे ये भी बहुत
जब अलग किया गया होगा मानव देह से
पटकी होगी पूँछ
लगाई होगी जीवन की गुहार
पर सफलता की भूख में
चटखारे और डकार के लोभ में
कौन रुका है ?
कौन रुकेगा ?
कौन डालना चाहेगा वापस देह में
ये मरे ही भले हैं
मर के ही बेचे जाते हैं
तभी तो
देखो तो
कितनों नें भर लिए हैं
अपनी कलम में स्याही की जगह
अब सरपट दौड़ती हैं कलमें
जैसे दौड़ते है घोड़े
आगे .... आगे और आगे
इतना आगे की मंडियों की
गंध भी न पहुँच सके
तब किसी ऊँची मीनार पर चढ़ कर घोषित कर दे
इन मंडियों को
गन्दा और जलील
वंदना बाजपेयी

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