शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

अभिनय

अभिनय

यवनिका उठती है
प्रथम रुदन के साथ
खुले आकाश के नीचे
सज जाता है
विशाल रंगमंच
शुरू हो जाता है अभिनय
तनी हुई डोरियों के नीचे
अट्टहास करते किरदार
दृश्य बदलते ही करते हैं
वीभत्स रुदन
यु ही कभी कभी
दृश्य बदलते बदलते
चेहरा हो जाता है
भाव शून्य
या उभर आते है
दोनों भाव एक साथ
असमंजस में
लग जाते हैं प्रश्च चिन्ह्
अभिनय की पारंगता पर
लगाये जाने लगते हैं
कयास पर कयास
की स्वीकार नहीं दर्शकों को
अभिनय में घालमेल
इसी उहापोह में
बदलते किरदारों की
भाव चेहरा सँभालने की
एक अनाम सी उलझन के मध्य
यविनिका गिरती है
वंदना बाजपेई

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