शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

मन की उड़ान

मन की उड़ान


कभी कभी बाधित होजाती हैं
मन की उड़ान
सदूर क्षितिज पर 
स्वप्नों के लोक मे
उकेरा गया
परियों का देश
स्वर्णिम महल
भरभरा कर गिर पड़ता है
ताश के पत्तों के ढेर सा
अर्पित हो जाती हैं
श्रधांजलि की दो बूंदे
अनाम चिताओं पर
समेट लेता है मन अपने पंख
बरसों बरस बाद
जब खड़कता है कोई
सुखा पत्ता
फूटता है कोई अंडा
जैसे फूटती हैं कोंपले
कुछ नए पर
हसरतों के उग आते हैं
पुनः बनने लगता है
क्षितिज पर
स्वर्णिम महल,परियों का देश
जानते बूझते हर सत्य
अपरिचित दिशा में
उड़ने लगता है मन
पुनः पुनः
निराश होने को
कौन समझा है ?
कौन जाना है
ये मन आखिर चाहता क्या है ?
वंदना बाजपेई

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें