शुक्रवार, 15 मई 2015

जलजला

जलजला 


हे नाटककार !
कितना वीभत्स है
तुम्हारा दृश्य परिवर्तन
कि एक पूरा जीवंत नगर
भागती दौड़ती सड़के 
खिलखिलाते बच्चे
रूठते -मनाते
हंसों को जोड़े
कलरव करते फूल ,पशु, पक्षी
पलक झपकते ही
सम्मलित हो गए खंडहरों में
और
ऊँची ईमारतों के
भग्न अवशेषों के मध्य
जीवन स्वयं माँगने लगा
अपने होने का प्रमाण
वंदना बाजपेई

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