मंगलवार, 11 नवंबर 2014

****खिलौना ***
धीरे से आना इस घर में
नन्हा सा शिशु यहाँ पर है
जो खेल रहा है खिलौने से


पहला खिलौना अहंकार
बेहद कोमल -नाजुक अपार
टूटे जो खुद ही बार -बार
पिघले न किसी के रोने से

दूजा खिलौना क्रोध प्रबल
सौ हाथियों का इसमें बल
चाबी बस जरा घुमा भर दो
हो जाये खड़ा बिछौने से

तीसरा खिलौना कामनाएं
अतृप्त अपूरित वासनाएं
दौड़े खुद कीचड में रपटे
ये दाग मिटे न धोने से

चौथा खिलौना मोह -माया
पिंजड़े से लगती है काया
जितना घुसे उतना फंसे
डरता है सभी के खोने से

पांचवां खिलौना अभीप्सा
लालच ,लोभ ,धन की की इक्षा
जोड़े जीवन भर तन काट -काट
ले जाये न कुछ भी दोने से

मन खेल रहा है खिलौने से
मन खेल रहा है खिलौने से

वंदना बाजपेयी

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