सोमवार, 21 जुलाई 2014

                                                           !!!!!!!!!!!बेटी की माँ !!!!!!!!!!!!


अख़बार की सुर्ख़ियों से भयभीत मैं 
दिल पर पत्थर रख कर
अपनी मासूम बिटियाँ को समझा रही हूँ
स्त्री होने का अर्थ
रहना है हर पल सावधान सतर्क
की नरभक्षी हैं चरों तरफ
खीच रही हूँ स्वयं ही
उसके चारों ओर वर्जना की दीवारें
खड़े कर रही हूँ
अनेकों प्रतिबंधों के पहाड़
घूरती है बेटी
आँखों में हजारों प्रश्न लिए
मैं निरुत्तर सी प्रयत्न करती हूँ
दिखने का व्यस्त रसोई के कामों में
मुझे सुनाई  दे रहे है भयाक्रांत सी बेटी के
सुबकने के स्वर
भीग रही हूँ मैं ऊपर से नीचे तक
उसके गालों पर
लुढ़कते आंसुओं से
छूट रहे हैं मेरे हांथों से बर्तन
मेरे अदृश्य आंसू
मेरी मौन चीखें
एक ही बात कह रही हैं
अम्मा
आज समझी हूँ
जानी हूँ
तुम्हारी घबराई डबडबाई
आँखों का रहस्य
कितना कठिन  है
एक बेटी की माँ होना

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