"बात मन की "
क्या कह लेने से बँट जायेगी
पीड़ा तेरे -मेरे मन की ?
एक युद्ध अनवरत चलता मन में
मन ही स्वामी मन ही सेवक
मन पिसता दो पक्षो के रन में
क्या निष्पक्ष होने से रूक जायेगी
क्रीड़ा तेरे -मेरे मन की ?
दुःख से जब जीवन घिर जाता है
मन -श्रष्टि नष्ट होने लगती है
सागर आँखों में भर जाता है
क्या पीने भर से मुड़ जायेगी
धारा तेरे -मेरे मन की ?
कितना भी कोई साथ चले
पर मन के अंदर हम सब है
सदा ही नितांत निपट अकेले
क्या संग चलने से थम जायेगी
लीला तेरे -मेरे मन की ?
मनवांछित कुछ पा जाता है
बस दो पल खुश रह पता है
अगले पल फिर ललचाता है
क्या सब पाने पर घट जायेगी
लिप्सा तेरे -मेरे मन की ?
vandana bajpai
(11.01.14)
क्या कह लेने से बँट जायेगी
पीड़ा तेरे -मेरे मन की ?
एक युद्ध अनवरत चलता मन में
मन ही स्वामी मन ही सेवक
मन पिसता दो पक्षो के रन में
क्या निष्पक्ष होने से रूक जायेगी
क्रीड़ा तेरे -मेरे मन की ?
दुःख से जब जीवन घिर जाता है
मन -श्रष्टि नष्ट होने लगती है
सागर आँखों में भर जाता है
क्या पीने भर से मुड़ जायेगी
धारा तेरे -मेरे मन की ?
कितना भी कोई साथ चले
पर मन के अंदर हम सब है
सदा ही नितांत निपट अकेले
क्या संग चलने से थम जायेगी
लीला तेरे -मेरे मन की ?
मनवांछित कुछ पा जाता है
बस दो पल खुश रह पता है
अगले पल फिर ललचाता है
क्या सब पाने पर घट जायेगी
लिप्सा तेरे -मेरे मन की ?
vandana bajpai
(11.01.14)
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