शनिवार, 11 जनवरी 2014

baat man ki

                                                           "बात मन की "




क्या कह लेने से बँट  जायेगी
पीड़ा तेरे -मेरे मन की ?


एक युद्ध अनवरत चलता मन में
मन ही स्वामी मन ही सेवक
मन पिसता दो पक्षो के रन में
क्या निष्पक्ष होने से रूक जायेगी
  क्रीड़ा तेरे -मेरे मन की ? 


दुःख से जब जीवन घिर जाता है
मन -श्रष्टि नष्ट होने लगती है 
सागर आँखों में भर जाता है
क्या पीने भर से मुड़ जायेगी  
धारा तेरे -मेरे मन की ?

कितना भी कोई साथ चले 
पर मन के अंदर हम सब है
सदा ही नितांत निपट अकेले  
क्या संग चलने से थम जायेगी
लीला तेरे -मेरे मन की ?   

मनवांछित कुछ पा जाता है  
बस दो पल खुश रह पता है 
अगले पल  फिर ललचाता है
क्या सब पाने पर घट जायेगी
लिप्सा तेरे -मेरे मन की ?

vandana bajpai
(11.01.14)                     

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