रविवार, 22 दिसंबर 2013

main aur mere kavita

                                                                        "मैं और कविता "



जब भी मैं कविता लिखती हूँ ,लिखती ही जाती हूँ
मन भावो के अनमोल दाम मैं  बिकती ही जाती हूँ



विस्मृत कितनी बीती बातें ,कहती  कुछ पुकार-पुकार
आँसू जो मैं पी थी चुकी आ जाते फिर  से खोल द्वार
चुन -चुन घावो को बीन-बीन मैं   सिलती ही जाती हूँ 


मुरझायें कितने कमल पड़े थे मेरे  भावो के सागर में
टूटी कितनी कच्ची कलियाँ थी  मेरे मन के उपवन में
हर शब्द-शब्द हर छंद -छंद मैं खिलती ही जाती हूँ


जानती हूँ एक दिन छूटेगी मेरी यह नशवर काया
ढूंढोगे तो भी मिल न सकेगी  मेरे मन कि छाया 
पर यह क्या कम है शब्दो में मैं ढलती ही जाती हूँ

vandana bajpai

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