"मैं और कविता "
जब भी मैं कविता लिखती हूँ ,लिखती ही जाती हूँ
मन भावो के अनमोल दाम मैं बिकती ही जाती हूँ
विस्मृत कितनी बीती बातें ,कहती कुछ पुकार-पुकार
आँसू जो मैं पी थी चुकी आ जाते फिर से खोल द्वार
चुन -चुन घावो को बीन-बीन मैं सिलती ही जाती हूँ
मुरझायें कितने कमल पड़े थे मेरे भावो के सागर में
टूटी कितनी कच्ची कलियाँ थी मेरे मन के उपवन में
हर शब्द-शब्द हर छंद -छंद मैं खिलती ही जाती हूँ
जानती हूँ एक दिन छूटेगी मेरी यह नशवर काया
ढूंढोगे तो भी मिल न सकेगी मेरे मन कि छाया
पर यह क्या कम है शब्दो में मैं ढलती ही जाती हूँ
vandana bajpai
जब भी मैं कविता लिखती हूँ ,लिखती ही जाती हूँ
मन भावो के अनमोल दाम मैं बिकती ही जाती हूँ
विस्मृत कितनी बीती बातें ,कहती कुछ पुकार-पुकार
आँसू जो मैं पी थी चुकी आ जाते फिर से खोल द्वार
चुन -चुन घावो को बीन-बीन मैं सिलती ही जाती हूँ
मुरझायें कितने कमल पड़े थे मेरे भावो के सागर में
टूटी कितनी कच्ची कलियाँ थी मेरे मन के उपवन में
हर शब्द-शब्द हर छंद -छंद मैं खिलती ही जाती हूँ
जानती हूँ एक दिन छूटेगी मेरी यह नशवर काया
ढूंढोगे तो भी मिल न सकेगी मेरे मन कि छाया
पर यह क्या कम है शब्दो में मैं ढलती ही जाती हूँ
vandana bajpai
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