" कारीगर "
मैं भी तो एक कारीगर हूँ
मैं कहा किसी से कमतर हूँ
तपते यथार्थ के धागो से
मैं ख्वाब नया बुन लती हूँ
कितना भी पतझड़ फैला हो
गिरे पीले पत्तो का मेला हो
सूखे ठूठों में ढूंढ -ढूंढ कर
मैं कुछ कलियाँ चुन लती हूँ
भीषण शोक कि वृष्टि में
आँसू से निमग्न सृष्टि मैं
घायल सूखे होंठो पर
मैं हँसने का गुण लती हूँ
नीरव निशब्द सी शांति में
मन दुविधा और भ्रांति मैं
निपट अकेलेपन में भी
मैं राग कोई सुन लती हूँ
हर हार मुझे करती विकल
पर उससे ले नया सम्बल
अपनी गलती से सीख-सीख
मैं राह नयी चुन लेती हूँ
vandana bajpai
मैं भी तो एक कारीगर हूँ
मैं कहा किसी से कमतर हूँ
तपते यथार्थ के धागो से
मैं ख्वाब नया बुन लती हूँ
कितना भी पतझड़ फैला हो
गिरे पीले पत्तो का मेला हो
सूखे ठूठों में ढूंढ -ढूंढ कर
मैं कुछ कलियाँ चुन लती हूँ
भीषण शोक कि वृष्टि में
आँसू से निमग्न सृष्टि मैं
घायल सूखे होंठो पर
मैं हँसने का गुण लती हूँ
नीरव निशब्द सी शांति में
मन दुविधा और भ्रांति मैं
निपट अकेलेपन में भी
मैं राग कोई सुन लती हूँ
हर हार मुझे करती विकल
पर उससे ले नया सम्बल
अपनी गलती से सीख-सीख
मैं राह नयी चुन लेती हूँ
vandana bajpai
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