मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

kavi

                                                                    "कवि "



हाँ मैं कवि हूँ
पर मैं बहुत मुश्किल में हूँ

कितने दर्द छिपे है दिल में मेरे
पढ़ लती हूँ मैं अनाम चेहरे
हर दर्द बन जाता है दर्द मेरा
हर आँसू ने मेरा नेत्र घेरा

डूबती हूँ मैं भॅवर में
मैं ही साहिल भी हूँ

एकश्रृष्टि है बसी मेरे निलय में
जन्म लेते रोज़ मिटते ,प्रलय में
है गढ़ा उनको ये मैं जानती हूँ
पर कहा खुद से अलग मानती हूँ

संग चढ़ती डोलियों में
मैं जनाजों में शामिल भी हूँ


है नहीं आसान कविता को बनाना
पड़ता है खुद में ही डूब जाना
दर्द पढ़ने का मिला है आधिकार
आंसुओ में डूब कर मिला है प्यार

हूँ बहुत दूर सबसे
पर काव्य से हाँसिल भी हूँ

vandana bajpai

   

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