शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

जिंदगी खेल हैं ...... पर कौन सा

जिंदगी खेल हैं ...... पर कौन सा



गलत है वो
जो कहते हैं
जिंदगी शतरंज का खेल है 
कहाँ खड़ी होती हैं दो सेनायें
आमने -सामने
बिना किसी धुंधलके के
बिकुल काली या बिलकुल सफ़ेद
नहीं
यह तो खेल है
ताश का
जहाँ शह और मात के बीच
नहीं दिया जाता है जरा ठहरकर
सोचने का मौका
कि छुपे रहते हैं पत्ते
सिमिटी हथेलियों में
दिखाते हैं रंग
जब लाख मुकुट पहने हुए भी राजा
परास्त हो जाता है
तुरुप कि दुक्की से
मत दोष दो किस्मत के घोड़े को
जो बताकर चलता है ढाई घर
सावधान !
जरा संभल कर खेलो
कि कोई तुम्हारी
आँख के ठीक आगे
पत्ते बदल रहा है

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