बुधवार, 29 जनवरी 2014

reheshy

                                                            "रहस्य "



कभी -कभी लगता है 
धीरे -धीरे
सरकती जा रही है
हंथेली सेधूप
जिसे
सुदूर जाने कितनी
आकाश गंगाओं को
पार कर
बंद मुट्ठी में
ले कर
आये थी
अब लगता है
कुछ जान लूँ
कुछ समझ लूँ
कुछ खोल लूँ
परते
उजालों की
जिससे धूप न सही
कुछ ऊष्मा
तो ले जाऊ
अनिश्चित मार्ग पर
और फिर
जब आऊ
पहली किरण के साथ
मुट्ठी बंद
करे हुए
तो कुछ तो
जुड़ जाए
ये
प्रयास
वंदना बाजपेई
29 . 01 . 14 

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