बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

kaash

                                                              "काश "



समझ रही थी मैं जान रही थी 
तेरे दुःख से अनजान नहीं थी
काश मैं कुछ कर पाती

रोक रही थी वेग अश्रु का
पर थी होंठो से मुस्काती
काश मैं कुछ कर पाती

चीख रही थी मन ही मन
शब्द -शब्द मिश्री बरसाती
काश मैं कुछ कर पाती

खंडित मन से टूटी -टूटी
ऊपर का आकार सजाती
काश मैं कुछ कर पाती

प्रतिबंधित कर क्षेत्र ह्रदय का
लक्ष्मण -रेखा खीचती जाती
काश मैं कुछ कर पाती

अभिनय में थी तुम पारंगत
पर मेरी पीड़ा बढ़ती जाती
काश मैं कुछ कर पाती

वंदना बाजपेई


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