"बुआ "
अभी कुछ दिन पहले खबर आयी कि बुआ नहीं रही ………द्रवित ह्रदय से मैं यादों के पन्ने खंगालने लगी। वो मेरे दूर के रिश्ते से बुआ थी ,बाल-विधवा करीब 15 वर्ष की रही होंगी जब 17 वर्षीय फूफा जी के साथ गंगा -स्नान को हरिद्वार गयी होंगी … उन्हें डूबने से बचाते-बचाते फूफा जी नहीं बच पाये … पार्थिव शरीर भी नहीं मिला।
याद करती हूँ जब बुआ घर आयी थी। मैं उनको अपलक देखती रही। अतिशय सौंदर्य … काले -सफ़ेद बालों की चादर ओढ़े चंद्रमा सा सुन्दर मुँख। हाँ हफ्ते में ५ व्रत करने के कारन जर्जर शरीर ……एक पति विहीन,पुत्र विहीन अतिशय सुन्दर अबला नारी का अपने को अपनों के कुदृष्टि से बचाने के लिए खुद को कंकाल की हद तक निर्बल करने के पीछे क्या प्रयोजन हो सकता है ये मेरा बाल -मन तब नहीं समझ पाया था।
हमारी बुआ के साथ अच्छी दोस्ती हो गयी। उनको खुश करने के लिए हमने उन्हें अपने साथ "डॉ कोटिनीश की अमर कहानी ''फ़िल्म देखने के लिए बिठा लिया। (फ़िल्म में नायिका ,मरते हुए नायक से सिन्दूर भरवा कर तुरंत विधवा हो जाती है )फ़िल्म देखते -देखते बुआ रोने लगी. ....... कैसे कटेगी बिचारी पूरी जिंदगी,हमें बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि फ़िल्म ने उनकी दुखती राग को छु लिया था।
दूसरे दिन स्कूल से लौटने पर माँ ने डांटा "जाओ बुआ को सम्भालो चुप नहीं हो रही है। मैंने धीरे से बुआ के कंधे पर हाथ रखा। ……… बुआ ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथ में भीच लिए। …बिटिया हो सकता है तुम्हारे फूफा जी जीवित हों…कहीकिसी और शहर में …याददास्त चली गयी हो .......... मैं कैसे पहचानूँगी ……तब तो मूँछों की बस रेखा थी ,अब तो दाढ़ी भी आ गयी होगी …कद भी बढ़ गया होगा ……बिटिया तुम तो विज्ञान पढ़ती हो ,क्या कोई ऐसा तरीका है कि मैं उन्हें पहचान लू,मेरी आँखों से गंगा -जमुना बह चली।
उसके बाद मैंने जाना फूफा जी के साथ करीब साल भर के साथ ने उनके चारों ओर प्रेम कि मधुर यादों का ऐसा अभेद कवच बना दिया था कि उससे टकराकर हर दुःख हार जाता। युही नहीं कहते इसे जन्म -जन्मान्तर का रिश्ता।
छोटा सा साथ और प्रेम कि पराकाष्ठा ....... जाइये बुआ ,फूफा जी आप कि प्रतीक्षा कर रहे होंगे ……… अब दुल्हन के श्रृंगार में आप कितनी अच्छी लगेंगी।
वंदना बाजपेई
अभी कुछ दिन पहले खबर आयी कि बुआ नहीं रही ………द्रवित ह्रदय से मैं यादों के पन्ने खंगालने लगी। वो मेरे दूर के रिश्ते से बुआ थी ,बाल-विधवा करीब 15 वर्ष की रही होंगी जब 17 वर्षीय फूफा जी के साथ गंगा -स्नान को हरिद्वार गयी होंगी … उन्हें डूबने से बचाते-बचाते फूफा जी नहीं बच पाये … पार्थिव शरीर भी नहीं मिला।
याद करती हूँ जब बुआ घर आयी थी। मैं उनको अपलक देखती रही। अतिशय सौंदर्य … काले -सफ़ेद बालों की चादर ओढ़े चंद्रमा सा सुन्दर मुँख। हाँ हफ्ते में ५ व्रत करने के कारन जर्जर शरीर ……एक पति विहीन,पुत्र विहीन अतिशय सुन्दर अबला नारी का अपने को अपनों के कुदृष्टि से बचाने के लिए खुद को कंकाल की हद तक निर्बल करने के पीछे क्या प्रयोजन हो सकता है ये मेरा बाल -मन तब नहीं समझ पाया था।
हमारी बुआ के साथ अच्छी दोस्ती हो गयी। उनको खुश करने के लिए हमने उन्हें अपने साथ "डॉ कोटिनीश की अमर कहानी ''फ़िल्म देखने के लिए बिठा लिया। (फ़िल्म में नायिका ,मरते हुए नायक से सिन्दूर भरवा कर तुरंत विधवा हो जाती है )फ़िल्म देखते -देखते बुआ रोने लगी. ....... कैसे कटेगी बिचारी पूरी जिंदगी,हमें बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि फ़िल्म ने उनकी दुखती राग को छु लिया था।
दूसरे दिन स्कूल से लौटने पर माँ ने डांटा "जाओ बुआ को सम्भालो चुप नहीं हो रही है। मैंने धीरे से बुआ के कंधे पर हाथ रखा। ……… बुआ ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथ में भीच लिए। …बिटिया हो सकता है तुम्हारे फूफा जी जीवित हों…कहीकिसी और शहर में …याददास्त चली गयी हो .......... मैं कैसे पहचानूँगी ……तब तो मूँछों की बस रेखा थी ,अब तो दाढ़ी भी आ गयी होगी …कद भी बढ़ गया होगा ……बिटिया तुम तो विज्ञान पढ़ती हो ,क्या कोई ऐसा तरीका है कि मैं उन्हें पहचान लू,मेरी आँखों से गंगा -जमुना बह चली।
उसके बाद मैंने जाना फूफा जी के साथ करीब साल भर के साथ ने उनके चारों ओर प्रेम कि मधुर यादों का ऐसा अभेद कवच बना दिया था कि उससे टकराकर हर दुःख हार जाता। युही नहीं कहते इसे जन्म -जन्मान्तर का रिश्ता।
छोटा सा साथ और प्रेम कि पराकाष्ठा ....... जाइये बुआ ,फूफा जी आप कि प्रतीक्षा कर रहे होंगे ……… अब दुल्हन के श्रृंगार में आप कितनी अच्छी लगेंगी।
वंदना बाजपेई
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