मेरा अस्तित्व
मैं बर्फ की शिला नहीं ,
जो पिघल जाउंगी ।
मैं दीप की शिखा नहीं ,
जो की जल जाउंगी ॥ ,
मैं कोई पत्ता नहीं ,
जो की उड़ जाउंगी ।
मैं कोई धारा नहीं ,
जो की मुड़ जाउंगी ॥
मैं कोई तिनका नहीं ,
जो की बह जाउंगी ।
मैं कोई पत्थर नहीं ,
जो मील पर रह जाउंगी ॥
चलने की ठान ली है,
तो चलती ही रहूंगी ।
दुरूह पर्वतों पर ,
चढ़ती ही रहूंगी ॥
माना की गंतव्य का ,
मुझको पता नहीं है ।
अनिश्चितताएँ मार्ग की ,
मुझको सता रही हैं ॥
पर अनवरत चलने से ही ,
नदी सागर मिलते हैं ।
रूके हुए पानी में तो ,
कीड़े ही पलते हैं ॥
गर अंत होगा मेरा ,
मार्ग की व्यथा से ।
तो शिक्षा मिलेगी सबको ,
मेरी करूण कथा से ॥
हो सकता है जिस मार्ग पर ,
डगमग चलूँ मैं आज ।
अनुकरण करे उसका ,
कल को यही समाज ॥
इसलिए छोड़ कर ,
सोचना इधर उधर ।
चल पडूँगी अभी ,
दृष्टि जाती है जिधर ॥
(pic credit:google)

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