शनिवार, 23 नवंबर 2013

Mera Astitva

मेरा अस्तित्व



मैं बर्फ की शिला नहीं ,
जो पिघल जाउंगी । 
मैं दीप की शिखा नहीं ,
जो की जल जाउंगी ॥ ,

मैं कोई पत्ता नहीं  ,                                                      
जो की उड़ जाउंगी । 
मैं कोई धारा नहीं ,
जो की मुड़ जाउंगी ॥ 


मैं कोई तिनका नहीं ,
जो की बह जाउंगी । 
मैं कोई पत्थर नहीं ,
जो मील पर रह जाउंगी ॥ 

चलने की ठान ली है,
तो चलती ही रहूंगी । 
दुरूह  पर्वतों पर ,
चढ़ती ही रहूंगी ॥ 

माना की गंतव्य का ,
मुझको पता नहीं है । 
अनिश्चितताएँ मार्ग की ,
मुझको सता रही हैं ॥ 

पर  अनवरत चलने से ही ,
नदी सागर मिलते हैं । 
रूके हुए पानी में तो ,
कीड़े ही पलते हैं ॥ 

गर अंत होगा मेरा ,
मार्ग की व्यथा से । 
तो शिक्षा मिलेगी सबको ,
मेरी करूण कथा से ॥ 

हो सकता है जिस मार्ग पर ,
डगमग चलूँ मैं  आज । 
अनुकरण करे उसका ,
कल को यही समाज ॥ 

इसलिए छोड़ कर ,
सोचना इधर उधर । 
चल पडूँगी अभी ,
दृष्टि जाती है जिधर ॥

-Vandana Bajpai

(pic credit:google)

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