गुरुवार, 21 नवंबर 2013

kavi aur kavita

                                                             कवि और कविता 

कूकती हैं कोयलें धुन में अपनी 
आह हो या वाह हो संसार में 
कोयलों को फ़र्क़ पड़ता हैं नहीं 

जलता है दीपक ज्योत से अपनी 
हो महल या फिर हो झोपड़ी 
देख कर के तम को वो हरता नहीं 

है वही कवि जो मन की लिखे 
डर के आलोचना कि तलवार से 
कवि कोई काव्य गढ़ता है नहीं 

-Vandana Bajpai


(pic credit : Google)

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