kavi aur kavita
कवि और कविता
कूकती हैं कोयलें धुन में अपनी
आह हो या वाह हो संसार में
कोयलों को फ़र्क़ पड़ता हैं नहीं
जलता है दीपक ज्योत से अपनी
हो महल या फिर हो झोपड़ी
देख कर के तम को वो हरता नहीं
है वही कवि जो मन की लिखे
डर के आलोचना कि तलवार से
कवि कोई काव्य गढ़ता है नहीं
-Vandana Bajpai
(pic credit : Google)
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