गुरुवार, 21 नवंबर 2013

aah dilli waah dilli!

                                                           आह दिल्ली वाह दिल्ली !

उफ़ यह 
दिल्ली कि भीड़भाड़ 
आदमी पर आदमी सवार 
सुबह दस की मेट्रो 
रेड लाइट 
सड़क पर जाम घंटों 
टूटी चप्पल लेकर भागना 
दौड़कर बस पकड़ना 

ये भी कोई शहर है जीने के लिए 
दो पल नहीं सुकून  के लिए 

हो कर परेशान 
करने को विश्राम 
जाती हूँ अपने गाँव 
बैठ बरगद की छाँव 
वाह गप्पें ही गप्पें 
चाय और पकौड़े 
मज़ा ही मज़ा 

पर दो-चार दिन बाद 
आने लगती है दिल्ली याद 
वो क़ुतुबमीनार 
वो दिल्ली कि हाट 

वो चौड़ी-चौड़ी सड़कें 
जिनमें तय किया था मैंने सफ़र 
शून्य से सफलता तक 
और मेरी भाषा ने 
"हम" से "मैं" तक 

और सबसे ज्यादा 
वो चूल्हा 
जहाँ पकती हैं 
हर रोज़ ताज़ा ताज़ा 
खबरें 

- Vandana Bajpai

(pic credit : Google)

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