स्वप्न और यथार्थ
सपने…
सपने ही सपने
अनगिनत हज़ार
जन्म से ही मन पर
कर लेते हैं अधिकार
आँखें खुली हों या बंद
आ ही जाते हैं
बचपन से यौवन तक
बढ़ते ही जाते हैं
क्यों लगता है बार-बार
हाथ बढ़ाकर
छू लेंगे शायद
इंद्रधनुषी सपनों का संसार
फिर श्वेत अश्व पर सवार
आता है एक राजकुमार
ले जाता है सपनों के पार
जहाँ है सिर्फ और सिर्फ
हक़ीक़त का संसार
गुम हो जाते हैं सपनों के गीत
आटे कि लोइयों पर, बेलन की थाप में
अनसुनी ही रह जाती है यह पुकार
बच्चों कि उआं-उआं की आवाज़ में
फिर बरस दर बरस बाद
अचानक से लगाते हैं आवाज़,
जाने कैसे ये अंकुर फूट जाते हैं
और वृक्ष बन चुभने लग जाते हैं
और तब शुरू होती है एक जंग
स्वप्न और हक़ीक़त में
और लड़ना पड़ता है अपने ही
छदम आवरण और असलियत में
सपने…
सपने ही सपने
अनगिनत हज़ार
जन्म से ही मन पर
कर लेते हैं अधिकार
आँखें खुली हों या बंद
आ ही जाते हैं
बचपन से यौवन तक
बढ़ते ही जाते हैं
क्यों लगता है बार-बार
हाथ बढ़ाकर
छू लेंगे शायद
इंद्रधनुषी सपनों का संसार
फिर श्वेत अश्व पर सवार
आता है एक राजकुमार
ले जाता है सपनों के पार
जहाँ है सिर्फ और सिर्फ
हक़ीक़त का संसार
गुम हो जाते हैं सपनों के गीत
आटे कि लोइयों पर, बेलन की थाप में
अनसुनी ही रह जाती है यह पुकार
बच्चों कि उआं-उआं की आवाज़ में
फिर बरस दर बरस बाद
अचानक से लगाते हैं आवाज़,
जाने कैसे ये अंकुर फूट जाते हैं
और वृक्ष बन चुभने लग जाते हैं
और तब शुरू होती है एक जंग
स्वप्न और हक़ीक़त में
और लड़ना पड़ता है अपने ही
छदम आवरण और असलियत में
(pic credit: Google)

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