सिंदूर
नारी का श्रृंगार
सुहाग का प्रतीक
या प्रेम कि मूक भाषा
इन उपालंभों के अतिरिक्त
मुझे लगता है
रोज़ सुबह
दर्पण के सामने
अपनी मांग में लाल सिन्दूर से
मैं खींच देती हूँ
एक लक्षमण रेखा
जिसे देखकर
कुछ ठिठकते हैं
दूसरों के पाँव
आगे बढ़ने से
कुछ ठिठकते हैं
तुम्हारे पाँव
कहीं बहकने से
(pic credit: Google)

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