बेरहम वक़्त
पहले मैं वक़्त के साथ चलती थी
तेज - तेज भागती और फिसलती थी
इस भाग - दौड़ में पैर टूट जाते थे
मेरे अपने बहुत पीछे छूट जाते थे
फिर वक़्त को छोड़ा आगे चलने के लिए
खुद ही गिरने और संभलने के लिए
अब मैं वक़्त को भाव नहीं देती हूँ
क्योंकि मैं वर्तमान में ही जीती हूँ
वक़्त मुझे छोड़ आगे बढ़ जाता है
पर मेरे बिना खुद को अकेला पाता है
तब वक़्त दूसरा दांव आज़माता है
मुझे अतीत में खींच ले जाता है
यादों के खंडहर फिर खड़े हो जाते हैं
घावों के वट वृक्ष फिर बड़े हो जाते हैं
" वर्तमान में जियो " कहना आसान है
पर वक़्त इतना कहाँ मेहरबान है ?
- Vandana Bajpai
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