बढ़ चला है, अब अकेले बाँसुरी की तान पर
मन हुआ मीरा सखी री, आठ पहरे ध्यान कर
छूटते जाते नगर और गाँव, गालियां उर बसी
भेंट करने मैं चली जब से पिया को साँस लर
वंदना बाजपेयी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें