सोमवार, 3 नवंबर 2025

वंदना बाजपेयी के मुक्तक


 


इस जीत के साथ एक नया अध्याय भी शुरू हुआ है.... सपने देखने और उन्हें साकार करने का

खुली आँख जब देखे सपने, खुले खिड़कियां

हाथ मसलते रह जाते सब तंज झिड़कियाँ  

इस धरती से उस अम्बर तक हक अपना भी

लिए पताका बढ़ती जातीं  आज लड़कियां

वंदना बाजपेयी 

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