क़ाफूर होंगें गम ख़ुशियों की बयार में
ये एक भ्र्म तो था तुम्हारे इंतज़ार में
अच्छा किया उम्मीद की ठुकराई अर्जियां
खुद ही जुटाये हौसले जग के बज़ार में
वंदना बाजपेयी
कुछ अधूरी हसरतें कुछ बेतुकी पाबंदियां
साथ चलती ही रहीं बेमेल सी तुकबंदियाँ
शाम आने पर उमर की, जब बही-खाते खुले
वक्त पर पत्थर सरीखी तब लगीं हदबंदियां
वंदना बाजपेयी
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