बादल की पायल पहन, बरखा करती नृत्य
बूँद-बूँद रौने झरें, हुई धरा कृतकृत्य
हुई धरा कृतकृत्य, पहन कर हरियल साड़ी
सुर मिला सखी संग, खिली स्वर्णिम फुलवाड़ी
जीवन का विस्तार, सृजनकर्ता का दल-बल
बरखा-धरा प्रमाद, हेतु बन जाता बादल
वंदना बाजपेयी
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