ऐ जाते हुए साल अलविदा,
बहुत सताया तुमने,
कर दिया हमें घरों में कैद
ग्लोबल विलेज सिमिट गया घर के चाहर दीवारी के अंदर
बाँट जोहती रहीं आँखें पुरानी रौनकों की
भूल ही गए हम
दोस्तों के साथ गले मिलना
पीठ पर धौल -धप्पा
कभी भी किसी के घर जा कर ठसक कर बैठ जाना
दोस्तों की थाली से कुछ भी उठा कर खाना
तुम्हीं ने परिचय कराया हमारा
कोविड -19 के खौफ से
मास्क सेनीटाइजर और दस्तानों से
कुछ भी छू कर ,बार -बार हाथ धुलवाने से
कितनी नौकरियां छूटी ,
कितने स्वाभिमान टूटे ,
क्लास बंक कर मिलने की हसरत भरे
कितने दिल टूटे
पर हर बार की तरह
हमारी जिजीविषा भारी पड़ी तुम पर
हामने सीख ही लिया बेसिक सुविधाओं में जीना
घर के कामों को खुद ही कर लेना
कहीं न कहीं हम और टेक्निकल हो गए
छोटे कस्बे गाँव भी ऑनलाइन मुखर हो गए
हमने समझ ली है रिश्तों की अहमियत
पर्यावरण और हमारी सेहत का गणित
समझती हूँ ,तुम आए थे एक शिक्षक की तरह
सिखा रहे थे जिंदगी का पाठ
और एक अच्छे विधयार्थी की तरह सीख कर
हम जा रहे हैं दो हजार इक्कीस में
हमने सौंप दी है आशाओं की गठरी
इस नए साल को
नई समझदारी और ज्ञान से
हम अवश्य ही बेहतर बनाएंगे
प्रकृति के हाल को
आओ दो हजार इक्कीस स्वागत है तुम्हारा
नए जोश और नई उम्मीदों के साथ
हम फिर से तैयार हैं
करने को समय से दो -दो हाथ
हमने सौंप दी है आशाओं की गठरी
जवाब देंहटाएंइस नए साल को
नई समझदारी और ज्ञान से
हम अवश्य ही बेहतर बनाएंगे
प्रकृति के हाल को
बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति।