कसक
खुश थी मैं
अपने सपनों के पुष्प
परिवार की
नाक की
प्राषाण प्रतिमाओं पर
चढ़ाकर
बंद कर दिए थे
बुलबुल के गीत
पारिवारिक मर्यादाओं की
अँधेरी
गुफाओं में
तब तक
जब तक
मेरी बेटी ने नहीं कहा
माँ
मुझे मत बना देना
अपनी तरह
निर्जीव
अरमानों के साथ
सजीव।
वंदना बाजपेयी
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