वो ...
जो रोटी की तलाश में
आ गया है शहर
थकी - मांदी उदास शामों में
जब याद आ जाते हैं
गाँव में साथियों के साथ लगाये गए कहकहे
बढ़ा देता है टी वी का वोल्यूम
दबा कर इस शोर में वो शोर
फिर धीरे से बुदबुदाता है
मैं आऊंगा वापस
बस बेटी की शादी के लिए
जोड़ लू कुछ पैसे
जो रोटी की तलाश में
आ गया है शहर
थकी - मांदी उदास शामों में
जब याद आ जाते हैं
गाँव में साथियों के साथ लगाये गए कहकहे
बढ़ा देता है टी वी का वोल्यूम
दबा कर इस शोर में वो शोर
फिर धीरे से बुदबुदाता है
मैं आऊंगा वापस
बस बेटी की शादी के लिए
जोड़ लू कुछ पैसे
वो ....
जो ब्याह कर बड़े शहर आ गयी है
छोटे शहर की लड़की
जब याद करती हैं
सहेलियों के संग सावन के झूले
भाभियों के साथ लाड -मनुहार
तेजी से चलाती है करछुल
की हार जाए इससे
झूले की ऊँची -ऊँची पींगे
बुदबुदाती है
मैं आउंगी वापस
फिर किसी सावन में
झूलने
बस जरा
चिंटू की पढाई
बाबूजी का बुखार
घर का इंतजाम हो जाए
जो ब्याह कर बड़े शहर आ गयी है
छोटे शहर की लड़की
जब याद करती हैं
सहेलियों के संग सावन के झूले
भाभियों के साथ लाड -मनुहार
तेजी से चलाती है करछुल
की हार जाए इससे
झूले की ऊँची -ऊँची पींगे
बुदबुदाती है
मैं आउंगी वापस
फिर किसी सावन में
झूलने
बस जरा
चिंटू की पढाई
बाबूजी का बुखार
घर का इंतजाम हो जाए
वो ...
जो बस गया है विदेश
करता है काम बड़े ऊँचे दफ्तर में
नवाज़ा गया है कई सम्मानों से
खुशामद करने वालों की भीड़ की बीच में
जब याद आती हैं माँ की लोरियां
हो जाता है तनहा
कौन है अपना
बुदबुदाता है
मैं आऊंगा वापस
बस जरा
एक कदम ... दूर रह गया है आसमान
जो बस गया है विदेश
करता है काम बड़े ऊँचे दफ्तर में
नवाज़ा गया है कई सम्मानों से
खुशामद करने वालों की भीड़ की बीच में
जब याद आती हैं माँ की लोरियां
हो जाता है तनहा
कौन है अपना
बुदबुदाता है
मैं आऊंगा वापस
बस जरा
एक कदम ... दूर रह गया है आसमान
वो ...
जो असंख्य हैं
जो नाम , रोटी , शोहरत की तलाश में
हर शहरमें
मिल जायेंगे हर गली कूंचेमें
जीते हैं एक अधूरी सी जिंदगी
जो बंटे रहते हैं दो पाटों में
जहाँ होते हैं
नहीं हो पाते वहाँ
कुछ पाने को जब -जब आगे भागते हैं
पीछे भागता मन
बुदबुदाता है
मैं वापस जाऊँगा
जो असंख्य हैं
जो नाम , रोटी , शोहरत की तलाश में
हर शहरमें
मिल जायेंगे हर गली कूंचेमें
जीते हैं एक अधूरी सी जिंदगी
जो बंटे रहते हैं दो पाटों में
जहाँ होते हैं
नहीं हो पाते वहाँ
कुछ पाने को जब -जब आगे भागते हैं
पीछे भागता मन
बुदबुदाता है
मैं वापस जाऊँगा
बस यूँही बीरबल की खिचड़ी पकती रहती है
और जिंदगी की सर्द रातें कटती रहती हैं
और जिंदगी की सर्द रातें कटती रहती हैं
वंदना बाजपेयी
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