कभी कभी जिंदगी की किताब पर
लिखे हुए शब्द
लगते हैं सुलगने
पढना हो जाता है नामुमकिन
जब गहरे धुंए की पर्त आ जाती है
किताब और आँखों के बीच
इसी बीच
समय अपनी ही गति से
पलट देता है पन्ने
मजबूरन बढ़ना ही पड़ता है आगे
ये जानते हुए की
भस्म हो चुके पन्ने
कितना भी पुकारे
पर कुछ पन्ने
कभी पलटे नहीं जा सकते
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