रविवार, 28 फ़रवरी 2016

कठपुतलियां

 
काठ से निर्मित तो नहीं
फिर भी
अदृश्य धागों से बंधे
 अभिशप्त हैं हम
नाचने के लिए
पर
ऐठ जाती होंगी तुम्हारी भी अंगुलियाँ
रिश्ता होगा खून
आ जाता होगा कलाई में बल
पथरा सी जाती होंगीं आँखें
संतुलन को साधते -साधते
पर
शायद तुम भी अभिशप्त हो
नचाने के लिए
जरूरी हो गया है
तुम्हारे लिए भी
की खेल चलता रहे
क्योंकि
जब तक यह खेल है
तब तक तुम हो

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें