सोमवार, 7 जुलाई 2014

                                                            "ज़माना बदल गया है "


                                           
वो आँखें जो कभी
डरती थी स्वप्न देखने से 
  उन्होंने  सौप दिए थे 
अपने कुछ अनगढ़ से 
 कांच से कोमल सपने
तुम्हारे हाथों  में
इस आशा से कि
करोगे तुम इसकी रक्षा
पर तुम
अपनीं प्रभुता के मद में
बन बैठे विश्व -विधाता
मान ही बैठे
की अपराजेय है
तुम्हारे रथ के घोड़े
इसलिए
तोड़ते रहे
कांच से मुलायम स्वप्नों को
वर्जनाओं के पत्थर मार -मार कर
पर  …… 
गुजर गयी वो पीढ़ियाँ
जो सौप गयी हैं
यह टूटे कांच के टुकड़े
अगली पीढ़ी को
अब जरा सोच के हाथ लगाना इन्हे
कही लहू लुहान न हो जाओ
हां अब !!!
 लिखी जायेगी
नयी इबारतें
उपलब्धियों के आसमान पर
अब सही अर्थों में
बनेगा क्षितिज 
हमारे -तुम्हारे दरमियाँ
"ज़माना बदल गया है "


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