गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

                                                               "सुख -दुःख "




जब जानी थी
सुख -दुःख की परिभाषा
तो दुख से भयभीत हो
खीच दिया था
एक वृत्त
सुख के चारों ओर
की कही मिल न जाये
सुख के चटख रंगों मे
दुःख के स्याह रंग
और मैं
एक सजग प्रहरी की भाँति
अनवरत रही युद्ध रत
अन्धेरों से
पर अब
सोचती हूँ
जीवन तो परिधि पर ही बीत गया
जिसकी रक्षा मे रत
उसे भोगा कहाँ
इसलिए
भयमुक्त कर मन को
तोड़ दी है परिधि
मिल गए है
चटख रंगों मे
कुछ स्याह रंग
पर मन
अब शांत है
सहज है
क्योकि
यही तो जीवन है 

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