"प्रेम कविता "
मैं लिखना चाहती थी
प्रेम कविता
पर लिख ही नहीं पायी
ढालना चाहती थी ,उस गहराई को
पर शब्द कम पड़ गए
उकेरना चाहती थी ,उस गम्भीरता को
पर वाक्य अधूरे छूट गए
नहीं व्यक्त कर पायी
अपने मन के वो भाव
जब तुम्हारे साथ
खाना खाने की प्रतीक्षा में
दिन -दिन भर भूखी बैठी रही
जब तुम्हारी मन पसंद
डिश बनाने के लिए
सुबह से ले कर रात तक
हल्दी और तेल लगी साडी में
नहीं सुध रही
अपने बाल सवाँरने की
जब तुम्हारे घर देर से आने पर
और फोन न उठाने पर
चिंता और फ़िक्र में
डबडबाई आँखों से तुम्हारी कुशलता हेतु
मन लेती हूँ निर्जला व्रत
जब तुम्हारी गृहस्थी के
कुशल संचालन में
घडी की सुइयों के मानिंद
बिना उफ़ किये ,चलती रहती हूँ
चौबीसों घंटे ,बारहों महीने
अनवरत -लगातार
मुझे मॉफ करना
सुबह से शाम तक न जाने
कितनी प्रेम कवितायेँ लिखती हूँ मैं
जो तैरती है हमारे बीच हवा में
बजता है जिनका संगीत
घर के कोने -कोने में
पर नहीं पहना पाती
उन्हें शब्दों के वस्त्र
क्योंकि मेरा प्रेम
सदा से था ,है और रहेगा
मौन ,अपरिभाषित और अव्यक्त
मैं लिखना चाहती थी
प्रेम कविता
पर लिख ही नहीं पायी
ढालना चाहती थी ,उस गहराई को
पर शब्द कम पड़ गए
उकेरना चाहती थी ,उस गम्भीरता को
पर वाक्य अधूरे छूट गए
नहीं व्यक्त कर पायी
अपने मन के वो भाव
जब तुम्हारे साथ
खाना खाने की प्रतीक्षा में
दिन -दिन भर भूखी बैठी रही
जब तुम्हारी मन पसंद
डिश बनाने के लिए
सुबह से ले कर रात तक
हल्दी और तेल लगी साडी में
नहीं सुध रही
अपने बाल सवाँरने की
जब तुम्हारे घर देर से आने पर
और फोन न उठाने पर
चिंता और फ़िक्र में
डबडबाई आँखों से तुम्हारी कुशलता हेतु
मन लेती हूँ निर्जला व्रत
जब तुम्हारी गृहस्थी के
कुशल संचालन में
घडी की सुइयों के मानिंद
बिना उफ़ किये ,चलती रहती हूँ
चौबीसों घंटे ,बारहों महीने
अनवरत -लगातार
मुझे मॉफ करना
सुबह से शाम तक न जाने
कितनी प्रेम कवितायेँ लिखती हूँ मैं
जो तैरती है हमारे बीच हवा में
बजता है जिनका संगीत
घर के कोने -कोने में
पर नहीं पहना पाती
उन्हें शब्दों के वस्त्र
क्योंकि मेरा प्रेम
सदा से था ,है और रहेगा
मौन ,अपरिभाषित और अव्यक्त
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें