सोमवार, 24 मार्च 2014

                                                                कल, आज और कल 


पता नहीं क्यों
बार-बार
पलट-पलट
कर जाती हूँ
पुरानी डायरी की तरफ
जहाँ रह गए थे 
कुछ अधूरे शब्द
जिन्हें करना चाहती हूँ
पूरा
पर सूखी स्याही
और
पीले पन्नों पर
अब सम्भव नहीं है
कुछ लिखना..
इस उधेड़बुन में
अधूरे छूट जाते हैं
कुछ शब्द
नयी डायरी में
जिनमें लिखना था
आज।
जो पुनः बन जायेंगे
कल , मेरे "कल" में   
लौटने
का कारण।

Vandana Bajpai
(24/03/2014)

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