''परछाइयाँ "
रात के
अंधेरों में
साफ़
बहुत साफ़
दिखने लगती हैं
परछाइयाँ
टूटे हुए सपनों की
दर्द की ,टीस की
कसक की
आँखों के सामने
कई साये
हिलने लग जाते हैं
और हम
इन सायों से
भयाक्रांत
आँखें खोले
बस
करवट
बदलते रह जाते हैं
-vandana bajpai
(20-12-2013)
रात के
अंधेरों में
साफ़
बहुत साफ़
दिखने लगती हैं
परछाइयाँ
टूटे हुए सपनों की
दर्द की ,टीस की
कसक की
आँखों के सामने
कई साये
हिलने लग जाते हैं
और हम
इन सायों से
भयाक्रांत
आँखें खोले
बस
करवट
बदलते रह जाते हैं
-vandana bajpai
(20-12-2013)
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