वंदना वाजपेयी जी से परिचय फेसबुक के माध्यम से हुआ था। अटूट बंधन पर उनके मनोविज्ञान पर आधारित वार्ता चर्चा से बहुत प्रभावित हुई थी। मनोविज्ञान मेरा भी पसंदीदा विषय है और उनकी चर्चाओं में उनकी स्टडी की झलक मिलती थी। जब एक साझा उपन्यास लिखने का सोचा तो उनका नाम इसीलिये विशेष रूप से आया क्योंकि उसमें मनोविश्लेषण प्रमुख था।
बहरहाल अभी उनका दूसरा कहानी संग्रह वो फोन काॅल प्रकाशित हुआ तो उसे पढ़ने की इच्छा जाग उठी। तेरह कहानियों से सजे इस संग्रह को पढ़ना शुरू किया तो पूरा पढे बिना छोड़ नहीं पाई।
संग्रह की पहली कहानी वो फोन काॅल अपनी शुरुआत में कोई संकेत नहीं देती कि वह किस तरह की कहानी है लेकिन पहले पन्ने की अंतिम पंक्ति तक पाठकों में उत्सुकता जगा देती है। एक फोन काल के माध्यम से दो अजनबियों के बीच की बातचीत इतने उतार-चढ़ाव आशा निराशा उम्मीद के पायदान चढ़ती उतरती है कि पाठक दम साधे पन्ने पलटते जाता है और कई घटनाओं से गुजरता हुआ जिस रहस्य और परेशानी से रूबरू होता है वह कल्पनातीत होता है। यह कहानी इंसान के रूप में दूसरे इंसान को समझने के लिए अपने आप पर विश्वास पैदा करने के लिए उठाए गये छोटे छोटे कदमों से छोटी छोटी बातों के साथ आगे बढ़ती है। भारत जैसे पारंपरिक देश में एक ऐसी उलझन से जूझती लड़की जिसे बेकार की बातें कहकर नजर अंदाज कर दिया जाता है जिसे उसकी माँ पिता सहेली तक नहीं समझते एक अनजान शिक्षिका समझती है और समाधान तो नहीं लेकिन उसकी राह सुझाती है उस पर चलने की हिम्मत देती है और पाठक कहानी के बाद भी कहानी में खोया रहता है। कहानी उसके अंदर उतर कर उसके भीतर चलने लगती है। ऐसी कहानियाँ समाज के बहुत छोटे वर्ग की होते हुए भी बहुत बड़े वर्ग को उसके प्रति सचेत करती हैं इसलिए महत्वपूर्ण हैं।
तारीफ कहानी पुनः मनोवैज्ञानिक कहानी है। इस कहानी में नायिका अपने बनाए खाने की तारीफ का पूरी जिंदगी इंतजार करती है लेकिन जब उसे वह तारीफ मिलती है वह किस मंशा से की जाती है यह समाज का कड़वा सच है। इस कहानी की अंडरटोन हमारे घरों में समाज में महिलाओं के कामों के लिए विशेष तटस्थता के भाव को चित्रित किया गया है जो कटु सच है।
जिंदगी की ई एम आई कहानी भौतिकता की चाह में खुद को पैसा कमाने में झोंक देने वाले वे माता-पिता हैं जो जीवन की सबसे बड़ी खुशी खोने को हैं। पारिवारिक स्नेह की विरासत छोड़ आज पैसा दिखावा भौतिकता हमारे जीवन की प्राथमिकता बन गई है और इसमें सबसे ज्यादा अकेलापन मिलता है बच्चों और बुजुर्गों को। जबकि कहा जाता है कि सब कुछ बच्चों के लिए किया जा रहा है। बच्चों के लिए सबसे जरूरी क्या है यह जानने और समझने की कोशिश कोई नहीं करता। ऐसे में बच्चा भटक जाए कोई गलत कदम उठा ले तो दोष किसका है?
प्रेम की नई वैरायटी कहानी दैनिक जीवन की खबरों को बिंब बनाते हुए आगे बढ़ती है। घटनाएँ बदलती हैं बिंब बदलते हैं चिंतन चलता रहता है और आखिर पाठक पहुँचता है एक निष्कर्ष पर जो रोज रोज के बदलाव और हर नयेपन के बाद भी ठहराव के पक्ष में होता है। आखिर जीवन कब तक भागता रहेगा और ज्यादा के लिये? यह कहानी सोचने पर मजबूर करती है।
राधा का सत्याग्रह अपने कथ्य और शिल्प के कारण आकर्षित करती है। स्त्री जीवन इतनी विषमताओं से भरा हुआ है जहाँ उसका मान सम्मान उसकी सहजता सरलता मेहनत काम से नहीं बल्कि थोथी चीजों से आंका जाता है उस समय में राधा गांधीजी के सत्याग्रह को आदर्श बनाकर न सिर्फ अपनी निर्दोषता सिद्ध करती है बल्कि सबकी नजरों में अपना सम्मान भी पाती है। यह कहानी पढ़ते हुए प्रेमचंद याद आते हैं तो हमारे अपने घर की दादी बुआ माँ याद आती हैं जो जीवन भर बिना किसी चर्चा के ऐसे ही सत्याग्रह करती रहीं और अपना सम्मान प्राप्त करने में सफल हुईं। यह कहानी बताती है कि औरतों को अपने दम पर अपना मान सम्मान पाना कितना मुश्किल है यह पचास साल पहले भी मुश्किल था आज भी मुश्किल है।
पचास की एक कहानी अपने अनूठे कथ्य के कारण आकर्षित करती है। यह साहित्य जगत का सच है और इसमें लेखिकाओं के जीवन का वह सच भी है जो उन्हें अपने परिवार में उनकी लेखनी के प्रति उपेक्षा के रूप में झेलना पड़ता है।
संग्रह की सबसे वजनदार कहानी है वजन। वंदना जी की खासियत है कि वे समाज के अनछुए पहलुओं को उठाती हैं जो होते तो हमारे आसपास हैं लेकिन हमेशा नजर अंदाज कर दिये जाते हैं। यह कहानी अपने कथ्य शिल्प और शैली के कारण तो खास है ही अपनी छोटी छोटी सूक्तियों के कारण जीवन के बड़े-बड़े सूत्र देती चलती है। हम सभी अपने शरीर के साथ मन पर भी वजन उठाए चलते हैं समाज का परिवार का उपेक्षा और अपेक्षा का वजन। यह वजन हमारे जीवन को जिजीविषा को किस तरह प्रभावित करता है और इसे समझ कर जीवन के कठिन निर्णय लेना आगे बढ़ना कितना आवश्यक है। एक ओवरवेट लड़की के जीवन की कहानी जिसमें उसका खाना उसकी बीमारी बन चुका है। वह खाती है अपनी उपेक्षा से आहत होकर अपेक्षा के टूटने से अपमान से टूट कर अकेलेपन से जूझने को लेकिन समझता कौन है? हम ऊपरी चीजें देखने के आदी हैं उसके भीतर गहरे दबी समस्या दुख परेशानी को नहीं देखते नहीं देख पाते वहाँ दृष्टि जाती है वंदना जी जैसी लेखिकाओं की। ऐसी कहानियाँ जो नजर और नजरिए को विस्तृत करने के लिए जरूरी हैं।
भाषा सहज सरल है पुस्तक के पृष्ठ के रेशमी अह्सास जीवन की कड़वी सच्चाई पढ़ते हौले से सहलाते हैं। यदा-कदा प्रूफ की कुछ गलतियाँ हैं लेकिन कहानियों के प्रवाह में बह जाती हैं।
कविता वर्मा
वो फोन काॅल (कहानी संग्रह)
लेखिका वंदना वाजपेयी
भावना प्रकाशन
पृष्ठ 170
मूल्य 225/-
समीक्षा -कविता सिंह
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